Wednesday, November 20, 2013

तुम्हें याद नहीं करता हूँ


  
ये सोचते हुए कि मेरी आँखों से न गिर जाएँ
वो ओस में भीगे हुए दिन
मैं तुम्हें याद नहीं करता हूँ
तब भी नहीं जब मौसम कुछ खुशनुमा होकर
मुझे फूलों की महक में लिपटी हुई
बारिश की फुहारें भेज देता है
में उन हसीन दस्तकों को भी लौटा देता हूँ
जो तुम्हारा नाम लेकर
मेरी अलसाई आँखों को जगाने के लिए
सूरज की पहली किरणों की
सिफारिशों का ख़त लेकर खड़ी हो जाती हैं
सुबह सुबह मेरे सिरहाने
मैं झील की खामोशी और समुन्दर की
लहरों का जिक्र
खुद से कभी नहीं करता
मैं पत्तों की सरसराहटों और हवाओं में
गूंजते सन्नाटे से खुद को अलग रखता हूँ
मैं रात को सोने से पहले
चाँद की आँखों में गिरा देता हूँ पर्दा
और नींद न भी आये में रात को
सुनता नहीं हूँ
न ही कुछ बुनता हूँ
मैं उन ओस से भीगे हुए उन दिनों को
परखना चाहता हूँ
गिरने से रोक देना चाहता हूँ
आखिरी सांस से ठीक पहले तक

Friday, February 17, 2012

शायद तुमने कुछ कहा था

शायद तुमने कुछ कहा था
मैंने नहीं सुना
कुछ देखा था
या शायद नहीं
पर एक अनुभव
क्षणिक सा जिया था मैंने
जैसे कहीं से गिरी हो कोई
शबनमी बूँद
दिल के किसी मीठे से कोने में
और मेरे दिल की धडकनों को मिला था
एक हतप्रभ
सा विराम
तुम्हारे होंठों की वो कंपकंपाहट
छू के निकली थी मुझे
और मैं
तुम्हें सुन नहीं पाया था ...........

तुम्हरी आँखों के प्रश्न
तैरते हुए कब मेरे चेहरे से उतर कर
भीड़ में खो गए
मुझे नहीं मालूम
बस एक मासूम सी
कशिश
मुझको समेटने लगी थी
तुम्हारी आँखों में
और मैं विलीन होते
देखता रहा खुद को
जैसे छाँव निगल
जाती है धूप को
कहीं से अचानक आ जाता है जब
बादल का कोई टुकड़ा....
और मैं
तुम्हें सुन नहीं पाया था .......

फिर कहीं से लहराकर उतरी वो हवा
रख कर एक खुशबू
चुपके से
मेरे आगोश में
लौट गई
संग संग तुम्हारे
और मेरे होंठों पर
तैरती मुस्कराहट
बहुत देर तक
पीती रही उस नेह की बूँद को
जिसे अनजाने में ही सही
तुमने मुझे सौंप दिया था
जब तुम्हारे होंठों
से निकले थे कुछ शब्द
और मैं
तुम्हें सुन नहीं पाया था

तुम्हें क्या पता

समुन्दर पर बारिशें और नींद लापता
सीप की खुली आँखों को किसी बूँद का इंतज़ार
कुछ ऐसी ही तो है मेरी भी चाहत
तुम्हें क्या पता


आँखों में तैरती आकाशगंगा और चाँद लापता
फिर थकी पलकों से आंसुओं की विदाई
कुछ ऐसे ही तो मिलती है दर्द से राहत
तुम्हें क्या पता


कागज़ पर लिखी परछाई और देह लापता
खुद को मिटते देखा यूँ ही कई बार
कुछ ऐसे ही तो होती है अपने वजूद से बगावत
तुम्हें क्या पता


ये जिस्म तुम्हारे दर पर और रूह लापता
एक दिन तुमको भी छोड़ जायेंगे अकेला
कुछ ऐसे ही तो निभा जायेंगे तुमसे हम अदावत
तुम्हें क्या पता

तुम मुझे यूँ देखती हो तो

तुम मुझे यूँ देखती हो तो
एक झरना
बेआवाज गिरने लगता है
और
फूलों की पंखुरियाँ बिछने लगती हैं
एक ताल
जिसे मैं दिल कहता हूँ
महकता हुआ
भर जाता है
तुम्हारे प्यार से

तुम मुझे यूँ देखती हो तो
एक लम्हा
बेखबर सा, ठिठक जाता है
और
मेरी साँसों में अंकित हो जाता है
एक गहरा चुम्बन
एक किताब
जिसे में जीवन कहता हूँ
लिखना चाहता हूँ
ऐसे ही लम्हों से


तुम मुझे यूँ देखती हो तो
एक धूप उतरती है
मैं परछाई सा
मिटने लगता हूँ
और देखता हूँ तुम्हें
अपने भीतर झांकते हुए
एक घर
जिसे मैं वजूद कहता हूँ
तुम्हें सौंपना चाहता हूँ
बस, तुम आओं
किसी भी दिन

मैं और तुम

मैं और तुम
एक हुआ करते थे
मैं समझती थी और तुम
कहा करते थे
हम साथ-साथ चलते थे
मेरे कदम थोड़े छोटे थे और तुम्हारे बड़े
तुम आगे निकल गए
तुम्हें लगा होगा कि मैं तुम्हारे साथ हूँ
तुम्हारे ठीक पीछे
तुम बिना पीछे देखे बोलते रहे कि तुम मेरे साथ हो
बस कुछ दूर तक ही तुम सुनाई पड़े
तुमने मेरा हांफना नहीं सुना
तुम दूर निकल गए
और अब मैं खड़ी हूँ उस आखिरी कदम पर
जहाँ तुम्हें आखिरी बार सुना था
मैं खड़ी हूँ
मेरी परछाई का कद
धीरे-धीरे मुझे छोटा करने लगा है
भीतर कुछ टूटता सा है और
परछाई गहरा कर थोड़ी और लम्बी हो जाती है
तुमने मेरा हाथ नहीं थामा था
पर मैंने तुम्हें कहीं भीतर तक
कस के थामा था
पर वो दोपहर तक की ही बात थी
तुम्हारे वादों की शाम होने को आई है

उस दिन

कुछ तय नहीं था
पर उस दिन
हम रोज की तरह मिले थे और हँसे थे
तुम विदा गीत सुना रही थी
और मेरे होंठों पर एक शोक गीत था
हम अनजाने में ही कल को
गुनगुना बैठे थे

कुछ तय नहीं था
पर उस दिन
बहुत दिनों के बाद
हम याद कर रहे थे
अपनी पहली मुलाक़ात को
हमने गुजरे हुए लम्हों को
उधेड़ कर तह की
बहुत सी मुस्कुराहटें
और कुछ आंसू भी
अपने-अपने सफ़र के लिए

कुछ तय नहीं था
पर उस दिन
रोज की तरह सूरज डूब रहा था
और तुम अनायास ही पूछ बैठी थी
कभी देखा है ऐसा सूर्यास्त ?
फिर
आँखें बंद कर पीने लगे थे हम
अपने-अपने हिस्से का डूबता हुआ वो सूरज
इस बात से अनभिज्ञ कि
हमारे हाथ छूट गए हैं

Tuesday, June 14, 2011

कैसी बारिश हुई

कैसी बारिश हुई
रात भर
मन भीगता रहा चुपचाप
जिस्म बिस्तर पर था
और ख्वाईशें
देर रात तक टहलती रही
सड़कों पर

शुष्क अधरों पर
कुछ शब्द
कब से रखे थे अनकहे
बारिश में भीगे तो
आँखों में आ छुपे
अब जो मिलना
तो पढ़ना

नींद लौटा कर
भीगती यादों को
जो जगह दी
तो रात भर रोती
रही मिलके गले

पहर-पहर
गीली हो कर
रात सरक गई
कुछ लम्हे क्यों
मगर सूखे ही
रह गए
कैसी बारिश हुई
रात भर